सुबह से समझ ही नहीं आ रहा कि क्या लिखें, क्या कहें! सब कुछ जो कहा जाना चाहिए वो तो कह दिया है।
स्तब्ध हूँ। बस सोच रहा हूँ कि कितने परेशान होंगे वो 17 लोग जो रेलवे ट्रेक पर चलकर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपनों के पास जा रहे थे। कितने थके होंगे जब उन्होंने सोचा होगा कि रेल की सिल्लियों पर कुछ देर आराम कर लें। आगे की यात्रा में भूखा न रहना पड़े इसलिए सोते वक्त अपने बगल में ही रोटी संभाल कर रखी थी।
लेकिन उन थके हुए बेसहारा मजदूरों को क्या पता था कि रेल की जिन सिल्लियों पर वो अपनी थकान मिटाने की सोच रहे हैं, वही उनकी अर्थी बन जायेगा।
सरकार कहेगी ये तो एक दुर्घटना है। हम जाँच करवाएंगे। किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। ड्राइवर की गलती, किसी रेल कर्मचारी की गलती तो मजदूरों की गलती निकाल ली जाएगी। जब कि हम सब जानते हैं कि ये एक isolated accident नहीं है। एक परिस्थिति है जो पिछले कई दिनों से बनाई जा रही थी.. अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं murder by design..
औरंगाबाद में हुई दर्दनाक घटना से देश का हर "इंसान" हिल गया है। ये सिर्फ उन 15 बेसहारा मजदूरों की मौत नहीं है। असल में हम सब आज थोड़ा थोड़ा मर गए हैं। ये हर भारतीय की मौत है। #हमारी_मौत है!
और जो अब भी महसूस नहीं कर पा रहे या व्यथित नहीं हैं उनकी संवेदनाएं मर गयी हैं, इंसानियत मर गयी है। वो तो जीवित होकर भी मरे हुए हैं..
क्योंकि अब और क्या होगा जिसके बाद हमारी संवेदनाएं जगेंगी?
अब और क्या होगा जिसके बाद हम गलत को गलत कहना शुरू करेंगे?
अब और क्या होगा जिसके बाद हमें एक देश और समाज के तौर पर शर्म आनी शुरू होगी?
अब और क्या होगा जिसके बाद हम सत्ता में बैठे लोगों को उनके अपराध का एहसास कराएंगे?
स्तब्ध हूँ। बस सोच रहा हूँ कि कितने परेशान होंगे वो 17 लोग जो रेलवे ट्रेक पर चलकर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपनों के पास जा रहे थे। कितने थके होंगे जब उन्होंने सोचा होगा कि रेल की सिल्लियों पर कुछ देर आराम कर लें। आगे की यात्रा में भूखा न रहना पड़े इसलिए सोते वक्त अपने बगल में ही रोटी संभाल कर रखी थी।
लेकिन उन थके हुए बेसहारा मजदूरों को क्या पता था कि रेल की जिन सिल्लियों पर वो अपनी थकान मिटाने की सोच रहे हैं, वही उनकी अर्थी बन जायेगा।
सरकार कहेगी ये तो एक दुर्घटना है। हम जाँच करवाएंगे। किसी को छोड़ा नहीं जाएगा। ड्राइवर की गलती, किसी रेल कर्मचारी की गलती तो मजदूरों की गलती निकाल ली जाएगी। जब कि हम सब जानते हैं कि ये एक isolated accident नहीं है। एक परिस्थिति है जो पिछले कई दिनों से बनाई जा रही थी.. अंग्रेज़ी में जिसे कहते हैं murder by design..
औरंगाबाद में हुई दर्दनाक घटना से देश का हर "इंसान" हिल गया है। ये सिर्फ उन 15 बेसहारा मजदूरों की मौत नहीं है। असल में हम सब आज थोड़ा थोड़ा मर गए हैं। ये हर भारतीय की मौत है। #हमारी_मौत है!
और जो अब भी महसूस नहीं कर पा रहे या व्यथित नहीं हैं उनकी संवेदनाएं मर गयी हैं, इंसानियत मर गयी है। वो तो जीवित होकर भी मरे हुए हैं..
क्योंकि अब और क्या होगा जिसके बाद हमारी संवेदनाएं जगेंगी?
अब और क्या होगा जिसके बाद हम गलत को गलत कहना शुरू करेंगे?
अब और क्या होगा जिसके बाद हमें एक देश और समाज के तौर पर शर्म आनी शुरू होगी?
अब और क्या होगा जिसके बाद हम सत्ता में बैठे लोगों को उनके अपराध का एहसास कराएंगे?

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